Israel US Iran War: इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर संयुक्त सैन्य अभियान चलाकर अमेरिका ने पूरे मिडिल-ईस्ट को युद्ध की आग में झोंक दिया है। 28 फरवरी को अमेरिका ने इजरायली सेना के साथ मिलकर तेहरान पर पहला हमला किया था, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी। इसके बाद से ईरान ने इजरायल से लेकर मिडिल-ईस्ट के देशों में अमेरिकी सैन्य और ऊर्जा ठिकानों पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले जारी रखे हैं। ऐसे में अब संयुक्त अरब अमीरात समेत मध्य-पूर्व देशों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। मिडिल-ईस्ट में अब ऐसा कोई भी देश नहीं बचा है, जिस पर ईरान ने हमला न किया हो। लिहाजा अमेरिका ने अब यूएई से लेकर खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा का डर दिखाकर युद्ध व्यापार करना शुरू कर दिया है।
सुरक्षा का डर दिखाकर अमेरिका ने बेचे 23.5 अरब डॉलर के हथियार
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने यूएई समेत खाड़ी देशों को 23.5 अरब डॉलर के हथियार सौदे को मंजूरी दी है। अमेरिका ने इन हथियारों के सौदे को तब मंजूरी दी है, जब ईरान ने इन क्षेत्रों में मिसाइल और ड्रोन हमलों से तबाही मचा रखी है। कहा जा रहा है कि यूएई समेत खाड़ी देशों को उनकी सुरक्षा का डर दिखाकर अमेरिका ने अपना हथियार बेचने के लिए यह सौदा किया है। इनमें खाड़ी सहयोगियों के लिए 16.5 अरब डॉलर के हथियार और अकेले UAE के लिए 7 अरब डॉलर के हथियारों का सौदा किया गया है।
अनचाही जंग में फंसा मिडिल-ईस्ट
यूएई और खाड़ी देशों को 23.5 अरब डॉलर का हथियार बेचकर अमेरिका ने बड़ा गेम खेला है। क्योंकि मिडिल-ईस्ट अनचाही जंग में फंस गया है। मिडिल-ईस्ट का कोई भी देश इस जंग को नहीं चाहता है। ईरान भी कह रहा है कि मिडिल-ईस्ट में युद्ध की आग फैलाने का जिम्मेदार अमेरिका है। ईरानी हमलों से मिडिल-ईस्ट के सभी देश अपनी सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर चिंतित हैं। लिहाजा वह अमेरिकी हथियार खरीदने को मजबूर हो रहे हैं। अमेरिकी विदेश विभाग ने 19 मार्च को ईरान के साथ युद्ध तेज होने के बीच खाड़ी सहयोगियों की रक्षा मजबूत करने के लिए 16.5 अरब डॉलर के हथियार सौदे को मंजूरी दी है। ट्रंप प्रशासन ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए लगभग 7 अरब डॉलर के अतिरिक्त हथियार भी मंजूर किए हैं।
अमेरिका ने किन देशों को बेचा कौन सा हथियार?
अमेरिका ने 23.5 अरब डॉलर के कुल सौदे में सऊदी अरब को (8.4 अरब डॉलर) लंबी दूरी के डिस्क्रिमिनेशन रडार (4.5 अरब डॉलर), काउंटर-ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम (2.1 अरब डॉलर), 400 AMRAAM मिसाइलें (1.22 अरब डॉलर), और F-16 गोला-बारूद/अपग्रेड (644 मिलियन डॉलर) बेचा है। कुवैत को 8 अरब डॉलर के हथियार, जिनमें उच्च गति वाले लक्ष्यों को ट्रैक करने के लिए डिज़ाइन किए गए लोअर-टियर एयर और मिसाइल डिफेंस सेंसर रडार पर फोकस है। जॉर्डन को 70.5 मिलियन डॉलर के हथियारों में विमान और गोला-बारूद है। इसी तरह वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रिपोर्ट किया कि UAE के लिए लगभग 7 अरब डॉलर के अतिरिक्त अनऑफिशियल सौदे मंजूर हुए हैं, जिसमें पैट्रियट PAC-3 मिसाइलें (5.6 अरब डॉलर) और चिनूक हेलीकॉप्टर (1.32 अरब डॉलर) शामिल हैं।
अमेरिका की कमाई बढ़ी
अमेरिकी सरकार इन बिक्री को क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोगियों की रक्षा के लिए आवश्यक बताती है, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार ये पेंटागन को महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक लाभ प्रदान करती हैं। अमेरिकी सिस्टम बेचने से विदेशी सेनाओं को दशकों तक अमेरिकी प्रशिक्षण, पार्ट्स और सॉफ्टवेयर पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे लंबी अवधि का कूटनीतिक और परिचालन लाभ मिलता है। कुछ सौदों में बड़े द्वितीयक निवेश शामिल होते हैं; उदाहरण के लिए, 2025 में सऊदी अरब के साथ एक ऐतिहासिक सौदे में अमेरिकी टेक दिग्गजों से 80 अरब डॉलर का संयुक्त उद्यम प्रतिबद्धता शामिल थी। संघर्ष में ड्रोनों और AI के भारी उपयोग से Palantir Technologies जैसी विशेष कंपनियों को बढ़ावा मिला है, जिसका स्टॉक मार्च 2026 में 17% बढ़ा क्योंकि इसका सॉफ्टवेयर क्षेत्रीय हमलों को समन्वयित करता है। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि से अमेरिका, एक प्रमुख तेल और गैस उत्पादक के रूप में लाभान्वित होता है।
अमेरिका अभी ये हथियार क्यों बेच रहा है?
बिक्री को तेजी से ट्रैक किया जा रहा है, क्योंकि वाशिंगटन इसे ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष से जुड़े खतरों का सामना कर रहे खाड़ी सहयोगियों के समर्थन के रूप में पेश कर रहा है। अमेरिका खाड़ी देशों की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने का के बहाने अपने हथियारों की बिक्री करके डॉलर कमा रहा है। अमेरिकी हथियार निर्माताओं को भी इससे बड़ा फायदा मिल रहा है।